शाम की धुंध में घूमते कदम
जैसे शरद ऋतुरात्रि की ठंडी हवा और पत्तों की सड़न में ताल में चलते हैं, यहाँ एक अलगाव से भरी रात्रि का सामना होता है जब घूमते कदम और धीमी घंटे की ध्वनि प्राकृतिक रूप से मिल जाती है। भारत के पुराने गांवों की शाम को याद दिलाते हुए, यह स्केच पत्तों की सड़न, घंटे और एक हल्की से घूमते घोड़े की आवाज़ के बीच एक सुरीली यात्रा बनाता है। यह संगीत सोने और नींद के आराम के साथ मिलकर एक शांतिपूर्ण सपने की ओर ले जाता है, जहाँ बाहर की दुनिया धीरे से धुंध में घुल जाती है।
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